
✦ हमारी विरासत ✦
आठवीं सदी से गौरवमयी इतिहास
इक्ष्वाकु राजवंश से डिजिटल युग तक — आठवीं सदी से प्रवाहित ज्ञान-परंपरा का संरक्षण।

स्थापना कथा
गोलालारे समाज की विरासत
दिगम्बर जैन गोलालारे समाज अपनी आध्यात्मिक वंश-परम्परा इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) राजवंश से जोड़ता है — अयोध्या का वह प्राचीन सौर कुल जिसमें भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ), जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, का अवतरण हुआ।
शताब्दियों से गोलालारे समुदाय ने मध्य प्रदेश के हृदय-स्थल — ग्वालियर, भिंड, मुरैना — में बसते हुए अहिंसा, परोपकार एवं विद्वत्ता की अपनी परम्पराओं को इस क्षेत्र की सांस्कृतिक बुनावट में गूँथा।
ग्वालियर दुर्ग में 1525 ई. के शिलालेख, राजा गुलाब चन्द्र के संरक्षण में अंकित, जैन विरासत में समुदाय की गहरी जड़ों के स्थायी साक्ष्य हैं।


सात सहस्राब्दियों की यात्रा
काल-यात्रा
प्राचीन राजवंशों से डिजिटल युग तक।
☸इक्ष्वाकु वंश एवं प्रथम तीर्थंकर
हमारी वंश-परम्परा का मूल प्राचीन इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) राजवंश से है — अयोध्या का वह महान् सौर कुल जिसमें भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ), जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, का अवतरण हुआ। गोलालारे समाज अपनी आध्यात्मिक विरासत इसी पवित्र वंश-परम्परा से जोड़ता है।
☸इक्ष्वाकु वंश एवं प्रथम तीर्थंकर
हमारी वंश-परम्परा का मूल प्राचीन इक्ष्वाकु (सूर्यवंशी) राजवंश से है — अयोध्या का वह महान् सौर कुल जिसमें भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ), जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर, का अवतरण हुआ। गोलालारे समाज अपनी आध्यात्मिक विरासत इसी पवित्र वंश-परम्परा से जोड़ता है।
🔱राजा श्री गुप्त एवं जैन धर्म का प्रसार
गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में मध्य भारत में दिगम्बर जैन परम्परा का व्यापक प्रसार हुआ। ग्वालियर, भिंड एवं मुरैना क्षेत्रों में श्रावक समुदायों ने अहिंसा, विद्वत्ता एवं परोपकार की गहन परम्पराओं का संवर्धन किया। इस काल में अनेक जैन मंदिरों एवं शिलालेखों की स्थापना हुई।
🔱राजा श्री गुप्त एवं जैन धर्म का प्रसार
गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में मध्य भारत में दिगम्बर जैन परम्परा का व्यापक प्रसार हुआ। ग्वालियर, भिंड एवं मुरैना क्षेत्रों में श्रावक समुदायों ने अहिंसा, विद्वत्ता एवं परोपकार की गहन परम्पराओं का संवर्धन किया। इस काल में अनेक जैन मंदिरों एवं शिलालेखों की स्थापना हुई।
🏛ग्वालियर दुर्ग शिलालेख एवं राजा गुलाब चन्द्र
ग्वालियर दुर्ग के 1525 ई. के शिला-अभिलेख गोलालारे समुदाय की उपस्थिति एवं संरक्षण की साक्षी हैं। राजा गुलाब चन्द्र ने किले के भीतर जैन मंदिरों एवं विद्वत्-परम्पराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये शिलालेख आज भी हमारी प्राचीन विरासत की जीवंत गवाही देते हैं।
🏛ग्वालियर दुर्ग शिलालेख एवं राजा गुलाब चन्द्र
ग्वालियर दुर्ग के 1525 ई. के शिला-अभिलेख गोलालारे समुदाय की उपस्थिति एवं संरक्षण की साक्षी हैं। राजा गुलाब चन्द्र ने किले के भीतर जैन मंदिरों एवं विद्वत्-परम्पराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ये शिलालेख आज भी हमारी प्राचीन विरासत की जीवंत गवाही देते हैं।
⚑समाज की स्थापना — स्वतंत्रता का उषाकाल
भारत की स्वतंत्रता के शुभ अवसर पर दिगम्बर जैन गोलालारे समाज की औपचारिक स्थापना हुई। संस्थापक बुज़ुर्गों ने ग्वालियर, भिंड एवं मुरैना में बिखरे समुदायों को आस्था, पहचान एवं पारस्परिक सहयोग के एक ध्वज के नीचे संगठित किया।
⚑समाज की स्थापना — स्वतंत्रता का उषाकाल
भारत की स्वतंत्रता के शुभ अवसर पर दिगम्बर जैन गोलालारे समाज की औपचारिक स्थापना हुई। संस्थापक बुज़ुर्गों ने ग्वालियर, भिंड एवं मुरैना में बिखरे समुदायों को आस्था, पहचान एवं पारस्परिक सहयोग के एक ध्वज के नीचे संगठित किया।
🪷सोनागिर सामूहिक तीर्थयात्रा
समाज ने सिद्ध क्षेत्र सोनागिर की अपनी प्रथम बड़ी सामूहिक तीर्थयात्रा आयोजित की। यह परम्परा सामुदायिक एकता की वार्षिक धड़कन बन गई और बाद में गोलालारे जैन सेवा सदन परियोजना की प्रेरणा बनी।
🪷सोनागिर सामूहिक तीर्थयात्रा
समाज ने सिद्ध क्षेत्र सोनागिर की अपनी प्रथम बड़ी सामूहिक तीर्थयात्रा आयोजित की। यह परम्परा सामुदायिक एकता की वार्षिक धड़कन बन गई और बाद में गोलालारे जैन सेवा सदन परियोजना की प्रेरणा बनी।
📜विद्यार्थी छात्रावास, ग्वालियर
शिक्षा के महत्व को पहचानते हुए समाज ने ग्वालियर में विद्यार्थी छात्रावास की स्थापना की — उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को उत्तम आवास प्रदान करते हुए। यह विरासत आज भी युवा पीढ़ी को सशक्त बना रही है।
📜विद्यार्थी छात्रावास, ग्वालियर
शिक्षा के महत्व को पहचानते हुए समाज ने ग्वालियर में विद्यार्थी छात्रावास की स्थापना की — उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को उत्तम आवास प्रदान करते हुए। यह विरासत आज भी युवा पीढ़ी को सशक्त बना रही है।
✨वार्षिक समाज महोत्सव परम्परा
प्रथम वार्षिक समाज महोत्सव का शुभारम्भ हुआ, जिसमें हज़ारों परिवार प्रवचन, सांस्कृतिक उत्सव एवं सामुदायिक कल्याण चर्चाओं के लिए एकत्रित हुए — अब यह प्रत्येक गोलालारे परिवार के सामाजिक कैलेंडर का केन्द्रबिन्दु है।
✨वार्षिक समाज महोत्सव परम्परा
प्रथम वार्षिक समाज महोत्सव का शुभारम्भ हुआ, जिसमें हज़ारों परिवार प्रवचन, सांस्कृतिक उत्सव एवं सामुदायिक कल्याण चर्चाओं के लिए एकत्रित हुए — अब यह प्रत्येक गोलालारे परिवार के सामाजिक कैलेंडर का केन्द्रबिन्दु है।
◈डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का शुभारम्भ
समाज ने डिजिटल युग को अपनाते हुए अपने आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म का शुभारम्भ किया — सामुदायिक पहलों, धन-संग्रह, परियोजना प्रगति एवं विरासत संरक्षण की एक पारदर्शी खिड़की। एकता में शक्ति, सेवा में धर्म।
◈डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म का शुभारम्भ
समाज ने डिजिटल युग को अपनाते हुए अपने आधिकारिक प्लेटफ़ॉर्म का शुभारम्भ किया — सामुदायिक पहलों, धन-संग्रह, परियोजना प्रगति एवं विरासत संरक्षण की एक पारदर्शी खिड़की। एकता में शक्ति, सेवा में धर्म।
प्रामाणिक दस्तावेज़
विस्तृत इतिहास
पाटिया महाराज की पोथी एवं पुरातत्व अभिलेखों के आधार पर।
🏛️ श्री दिगंबर गोलालारे जैन जाति का इतिहास
भारतीय इतिहास और पुरातत्व अभिलेखों के अनुसार गोलालारे जैन वंश का गहरा सम्बन्ध प्राचीन इक्ष्वाकु वंश से रहा है। यह हमारे लिए अत्यंत गौरव का विषय है कि इसी इक्ष्वाकु वंश में हमारे 24 में से 14 तीर्थंकरों ने जन्म लिया।
✨ इक्ष्वाकु वंश में जन्मे 14 तीर्थंकर भगवान
नीचे उन 14 तीर्थंकर भगवानों की सूची दी गई है, जिनका जन्म इस पवित्र वंश में हुआ था:
| क्र. | तीर्थंकर का नाम | तीर्थंकर क्रम | क्र. | तीर्थंकर का नाम | तीर्थंकर क्रम |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | भगवान ऋषभदेव | पहले | 8 | भगवान वासुपूज्य | 12वें |
| 2 | भगवान अजितनाथ | दूसरे | 9 | भगवान विमलनाथ | 13वें |
| 3 | भगवान सम्भवनाथ | तीसरे | 10 | भगवान अनंतनाथ | 14वें |
| 4 | भगवान अभिनन्दन नाथ | चौथे | 11 | भगवान शांति नाथ | 16वें (मूल पाठ: 10वें) |
| 5 | भगवान सुमतिनाथ | पांचवें | 12 | भगवान मल्लिनाथ | 19वें |
| 6 | भगवान पदम्प्रभु | छठे | 13 | भगवान नमिनाथ | 21वें |
| 7 | भगवान पुष्प दन्त | नौवें | 14 | भगवान श्रेयांसनाथ | 11वें |
(नोट: कुल 24 में से इन 14 तीर्थंकर भगवानों का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ।)
📜 गुप्त साम्राज्य और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इसी वंश की वंशावली में चौथी शताब्दी में नाग बगातक युग की समाप्ति हुई और गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ:
- इस वंश के प्रथम राजा श्रीगुप्त के उत्तराधिकारी घटोत्कच हुए।
- घटोत्कच के पुत्र चन्द्र गुप्त प्रथम ने सन 319-320 ई. में 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण कर गुप्त वंश की स्थापना की। इस वंश ने सन 570 ई. तक राज्य किया।
- इसी वंश में समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त प्रथम जैसे प्रसिद्ध व प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की।
हूणों के आक्रमण और गुप्त वंश की पराजय के बाद 7वीं शताब्दी के अंत तक देश के सभी खण्डों से गुप्त वंश का राज्य पूरी तरह समाप्त हो गया।
📍 'गोलालारे' शब्द की उत्पत्ति और ग्वालियर आगमन
कालांतर में इसी वंश के राजा गुलाब चन्द्र हूण राजा 'मिहिरकुल' के भय से (जो कि गोलकुंडा मालव अंग था), अपने परिजनों के साथ आकर ग्वालियर में बस गए।
💡 गोलालारे नाम कैसे पड़ा? मालवा क्षेत्र में 'लारे' शब्द का अर्थ "समीप" (पास) होता है। गोलकुंडा से आने के कारण गुलाबचन्द्र जी के परिजनों को 'गोलालारे' कहा जाने लगा।
🏰 पावई ग्राम की स्थापना और प्राचीन मंदिर
इसी समय कन्नौज के राजा मोकुल परिहार ने ग्वालियर पर चढ़ाई कर दी और दोनों तरफ से युद्ध की तैयारी हो गई। उस समय ग्वालियर में 4 मुनिराज विराजमान थे; उनके सदुपदेश और युद्ध के लिए मना करने के कारण दोनों राजाओं के बीच संधि हो गई।
इसके पश्चात राजा गुलाब चन्द्र के पुत्र श्री ताराचंद हुए। उन्होंने अपने शासनकाल में एक ऐतिहासिक कदम उठाया:
- स्थापना वर्ष: विक्रम संवत 791
- स्थान: वर्तमान मध्यप्रदेश के ग्वालियर के पास, भिंड जिले की अटेर तहसील
- नदी: कुआरी नदी के किनारे
- नगर का नाम: 'पावई' (जिसे आज पावई ग्राम के नाम से जाना जाता है)
आज भी इस प्राचीन नगर के अवशेष देखे जा सकते हैं। उसी प्राचीन मंदिर के अवशेषों पर श्री दिगंबर गोलालारे जैन समाज ने नवीन जिन मंदिर का भव्य नवनिर्माण करवाया है। इसी मंदिर जी में 7वीं शताब्दी की भगवान नमिनाथ की अतिशयकारी जिन प्रतिमा विराजमान है।
🔄 गोत्रों का विभाजन और बुंदेलखंड प्रवासन (Migration)
समय के साथ समाज का विस्तार और विभाजन कुछ इस प्रकार हुआ:
- विक्रम संवत 891: राजा ताराचंद के पुत्रों के बीच विवाद के कारण गोलालारे जैन समाज में 'खरौआ' गोत्र बना।
- विक्रम संवत 1686: 'खरौआ' गोत्र गोलालारे जैन समाज से अलग होकर एक स्वतंत्र खरौआ जैन समाज के रूप में स्थापित हुआ।
- बुंदेलखंड प्रवासन: इसी समय काम-धंधे की तलाश में कुछ लोग बुंदेलखंड के झांसी, टीकमगढ़, ललितपुर आदि स्थानों पर जाकर बस गए। आज इन्हें बुंदेलखंड गोलालारे के नाम से जाना जाता है।
🎯 निष्कर्ष: जन्मभूमि एवं उद्गम स्थल
इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि वर्तमान श्री दिगंबर गोलालारे जैन समाज का उदय और उत्पत्ति विक्रम संवत 791 में राजा गुलाब चन्द्र के पुत्र ताराचंद्र व उनके पुत्र श्री मिट्ठू शाह के माध्यम से हुई।
समाज का मूल जन्मस्थान: वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य के भिंड जिले की अटेर तहसील में कुआरी नदी के किनारे बसा 'पावई ग्राम' ही गोलालारे जैन समाज (सहित खरौआ और बुंदेलखंड गोलालारे) की जन्मभूमि और उद्गम स्थल है।
📖 प्रमाण: ऐसा ही प्रामाणिक दस्तावेज 'पाटिया महाराज की पोथी' में दर्ज है। इस पोथी को समस्त गोलालारे जैन समाज मानता है, पूजता है और नमन करता है।
🏛️ ऐतिहासिक प्रमाण: ग्वालियर किले का शिलालेख
ग्वालियर किले के दक्षिण-पूर्व की ओर एक चट्टान पर बने जैन मंदिर में उपलब्ध यह शिलालेख, जिस पर 'सम्वत 1525' अंकित है, गोलालारे जैन समाज का एक ऐतिहासिक सत्य है:
"सिद्धेभ्यः श्री...सम्वत 1525 वर्षे चैत्र सुदी 15 मूलसंघे सरस्वती गच्छे बालाकार गणे श्री कुन्दकुन्दाचार्यन्वये आम्नाय भट्टारक श्री प्रभुचंद्र देव ततो दर्शन.. भरतशारक श्री सिंहकीर यतितिश्वर तेषांमद उपदेश, श्री गोपालाचल महादुर्गे श्री तामान्वये महाराजधिराज श्री कीर्तिसिंह विजयराजे ।...सिद्ध प्रतिष्ठा श्री इक्ष्वाकु वंशोन्द्वा गोलारोड ति मधे संघातपति पम ॥श्री॥..सुहाग श्री तत्पुत्र माणिक सं.अश्वपति सं.कुषराज सं.जो जि । सं माणिक भार्या लखन श्री तत्पुत्रा सं वन हरसिंघा । पडरु । कुमुदचंद्र भार्या कुल द्वितीय विजय श्री हरिसिंघा रामश्री दिः जयति श्री त शिव श्री ॥ पडरु बाय भागीरथी । कुमुदचंद्र भार्या शोनन श्री पुत्र ॥ अश्वपति ....भार्या .... श्री....पुत्र माधवभार्या माणिक्य श्री द्वितीय...पुत्र देवचन्द्र आर्या खिमश्री ॥ कुशराज भार्या लोहन द्वितीय भार्या पुत्र बुद्धसेन पुत्री हरमति जो जि समायहि श्री पुत्र ...कुंवरराय ॥ मंडे भार्या रतन श्री ॥ सजन श्री मंगो ...ये तषाम मध्ये संघादिपतिम ॥ भूपतयः बन्धु निज पुत्र पौत्रों श्री पार्श्वनाथ तीर्थश्वरम नित्यं पूज्यम प्रणमति श्री शांति रस्तु शिवम् सुख नित्य द्वितीय आरोग्य भवतु ...सिद्धरस्तु शत्रु निवारण कुल गोत्र वंशादस्तु इति श्री राजा श्रावक प्रजासुखि नो भवन्तु धर्मों भगवंतम श्री ॥"
जैन धर्म के तीन स्तम्भ
जिन नींवों पर हमारा समुदाय टिका है।

अहिंसा
सभी जीवों के प्रति अहिंसा — जैन धर्म की आधारशिला।

सत्य
विचार, वचन एवं कर्म में सत्य — तीर्थंकरों की शिक्षा।

अपरिग्रह
अपरिग्रह — कम रखना, अधिक देना।
“सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र — सम्यक् श्रद्धा, सम्यक् ज्ञान एवं सम्यक् आचरण ही मोक्ष का मार्ग है।”
— तत्त्वार्थ सूत्र, पवित्र जैन ग्रन्थ